उजाला रोज होता है,
अँधेरा मन में फिर क्यूँ है!
तूँ मुझसे दूर है इतनी,
बसेरा मुझ में फिर क्यूँ है !
हूँ तुम बिन क्यूँ अंधूरा मैं,
तूँ मुझ बिन पूर कैसे है!
तुम्हें बस मैं मिला हूँ तो,
मिलन मजबूर कैसे है !
तूँ मुझसे कब मिली थी ये,
नहीं मैं जानता अब हूँ !
तेरा घर मन में है मेरे,
यही मैं मानता अब हूँ।
बहुत हैं हूर दुनियाँ में,
अदा ये तुममें फिर क्यूँ है!
तूँ मुझसे दूर जब इतनी,
बसेरा मुझ में फिर क्यूँ है !
बताती क्यूँ नहीं कुछ तुम,
तड़फ ये मन में कैसी है।
मना तुम क्यूँ नहीं करती,
झड़प ये मन में कैसी है!
बहुत अन्जान मैं जो हूँ,
तूँ भी नादान फिर क्यूँ है!
तूँ मुझसे दूर क्यूँ इतनी,
बसेरा मुझ में फिर क्यूँ है !
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्य।
दिनाँक: 18/01/2015
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