शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

-: ये भूल थी मेरी कुछ या भूल ही किया है :-

हमदर्द मेरा होके, तूँ दर्द क्यूँ दिया है,
ये भूल थी मेरी कुछ, या भूल ही किया है।

साथ हम जिएंगे, अब साथ ही मरेंगे,
ये आरजू तेरी थी, या थी कोई बनावट,
कलाइयों में मेहँदी, वो नाम की लिखावट,
ये प्रेम की कला है, या झूट की सजावट,
दिया था हमने कंगन, क्यूँ हाथ में लिया है।
ये भूल थी मेरी कुछ, या भूल ही किया है।

है नाम तेरा दिल में, बदनाम क्यूँ महफ़िल में,
ये कैसे मैं दिखाऊँ, हूँ मैं ही तेरे दिल में,
सुबूत मैं क्या लाऊँ, एक था मेरा तूँ अपना,
अब ठहरी जिन्दगी है, टूटा हुआ है सपना,
ऐ संग मरने वाले, एक खून क्यूँ किया है।
ये भूल थी मेरी कुछ, या भूल ही किया है।

थी हमने की मुहब्बत, ली हमने अब सजा है,
प्यार की ये फितरत, तेरी तो हमनवा है,
एक पल को ही सही पर, तू दर्द की दवा है,
क्या खूब वो खुदा है, जो तेरा ही गवाह है,
दर्द का ये मंजर, थाम हमने अब लिया है।
ये भूल थी मेरी कुछ, या भूल ही किया है।
        (सर्वाधिकार सुरक्षित)
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या।
दिनाँक:- १२/१२/२०१४

रविवार, 16 नवंबर 2014

घूँट प्रेम का बहुत कड़ा है

प्रेम का बंधन सबसे नाजुक,
घूँट प्रेम का बहुत कड़ा है,
पाके इसको बन गया कोई,
और कोई वीरान खड़ा है।

दीवाल नहीं देखा है इसमें ,
छत इसका पर बहुत बड़ा है,
नींव प्रेम की होती अद्भुत,
स्थान मध्य में बहुत बड़ा है।

पार किया है जिसने इसको,
नाम ही उसका कृष्ण पड़ा है।
विचलित हो गया जो भी इसमें,
वह देखो बर्बाद पड़ा है।

"मौर्य" प्रेम है नहीं समर्पण,
कौन है किसको ढो पायेगा,
प्रेम प्रेमियों से है जन्मा,
कौन अकेला रो पायेगा।

एक एव है भक्ति समर्पण,
जहाँ कोई भगवान बड़ा है,
सौर्यवान है सूर्यमान है,
महाशक्ति का पुंज गढ़ा है।

प्रतिव्यक्ति ही होता महाशक्ति यदि,
कौन है जग में प्रेम जो करता,
चंद-शक्ति है जिसने पाया,
अपने हवसों को नित भरता।

प्रेम है आशा का आभूषण,
जीवन जिसका बहुत बड़ा है,
पाके इसको बन गया कोई,
और कोई बर्बाद पड़ा है।
             ***
                   --- अंगिरा प्रसाद मौर्या।
दिनाँक :-१६/११/२०१४

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कुछ शाब्दिक अर्थ :-
कृष्ण = अमर, कभी न मरने वाला अथवा जिसकी स्मृतियाँ कभी न भुलाई जा सकें।

मध्य-स्थान= नींव और छत के बीच का स्थान।

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

तेरे घर की ओर चलूँ मैं :-

प्रेम का प्यासा जीवन मेरा, प्रेम की आशा का घर तेरा,
तेरे घर की ओर चलूँ मैं, वर्षा ऋतु का मोर बनूँ मैं।

मेरे जीवन की उज्वलता, कहीं तुम्हारे पास रखी है,
बातों में तेरी कोमलता, मेरे घर की आस रटी है,
मेरी मोरनी क्या जानों तुम, सपन तुम्हारे रोज रचूँ मैं !
तेरे घर की ओर चलूँ मैं, वर्षा ऋतु का मोर बनूँ मैं।

श्रम से मुझमें थकन जो आती, एक पल मानों रुक जाता मैं,
इतने में जो तू मुस्काती, मानों तुझमें छुप जाता मैं,
तेरी प्रीत से मैं जीता अब, लक्ष्य के अपने ओर बढूँ मैं !
तेरे घर की ओर चलूँ मैं, वर्षा ऋतु का मोर बनूँ मैं।

कमी नहीं उत्साह की मुझमें, दुनियाँ में धुंधली ये पड़ती,
"मौर्य" नहीं देखा दुनियाँ में, मात्र आम की गुठली मिलती,
मेरी मोरनी आ जाओ अब, इस दुनियाँ में शोर बनूँ मैं !
तेरे घर की ओर चलूँ मैं, वर्षा ऋतु का मोर बनूँ मैं।
_________ ०९/१०/२०१४
     *** अंगिरा प्रसाद मौर्या ***
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मात्र आम की गुठली मिलती :- यहाँ पर यह पंक्ति बहुत ही महत्वपूर्ण है जिसको समझने हेतु विभिन्न दृष्टिकोणों से भिन्न भिन्न अनुवाद एवं आशय का जन्म हो सकता है। इसलिए इस की व्यख्या करने पर विवश एवं प्रतिबद्ध हूँ।
विचारणीय यह है कि आम की गुठली का ज्यादा महत्व नहीं है। जबकि पूरे आम का महत्व विश्व-व्याप्त है। इसी प्रकार हम एक सन्यासी न होकर हम श्रमिक हैं और बिना जीवनसाथी के सांसारिक संघर्ष में हमारी उर्जा कम पड़ जाएगी हम हतास भी हो जायेंगे। अतः हमारे जीवन में जीवन संगिनी बहुत महत्वपूर्ण है जो जीवन पथ पर हमें प्रोत्साहित करती है। इतने बड़े व्यख्या का पूरा सारांश यही है कि मैं एक गुठली हूँ और वो रस।