प्रेम जगत
प्रेम जगत में आपका स्वागत है ! हम अपने शब्दों में जो कुछ भी लिख पायें हैं वो आपके समक्ष प्रस्तुत है। बस !अब हमें आपका प्यार चाहिए !
बुधवार, 11 दिसंबर 2019
जय श्री राधे
शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018
समंदर हो या कोई वस्तु
सच है कि समंदर कभी सूखता नहीं !
ये सच है कि समंदर कभी सूखता नहीं !
समंदर को वो क्या जाने,
जिसकी उसतक पहुंच ही नहीं !
#APM
शुभ रात्रि !
जय श्री कृष्ण !
शनिवार, 30 जुलाई 2016
हम बहते चले जाएँ
कुछ तुम भी बताओ,
कुछ हम भी बताएं,
आओ बैठ जाओ,
गीत गुनगुनाओ,
उसे हम भी सुनेंगे,
ये हवा भी सुनेगी,
ये शाम है सुहानी,
अब हमारी कहानी,
तुम पर है अटकी,
हिम्मत करो थोड़ा,
कुछ कर दो इशारे,
कुछ खींच दो रेखाएँ,
जो हमको समझ आये,
शुरुआत हमने की है,
हवा तुम बस दे दो,
हम बहते चले जाएँ,
हम बहते चले जाएँ,
हम कहाँ तक है पहुँचे,
न हमको पता हो ,
न तुमको पता हो,
हम बहते चले जाएँ,
हम बहते चले जाएँ !
दिनाँक :- ३०/०७/२०१६
–----------– अंगिरा प्रसाद मौर्य
शनिवार, 14 मार्च 2015
-: मैं अनपढ़ हूँ प्रेमजगत में :-
मैं अनपढ़ हूँ प्रेमजगत में, तुम ही मेरी भाषा हो !
तुम मेरी अभिलाषा हो ! तुम मेरी जिज्ञासा हो !
आस तुम्हारे जीवन चलता, पास तुम्हारे है उज्ज्वलता।
बिना तुम्हारे नहीं सफलता, तुमसे ही सामर्थ्य निकलता।
तुम हो प्यारी मूरत जैसी, बोल तुम्हारे हैं अतिकोमल।
निशा के जैसी शीतल छाया, किरण तुम्हारे सबसे निर्मल।
तुम वसुधा की बेटी हो, तुम अम्बर की आशा हो।
तुम मेरी अभिलाषा हो, तुम मेरी जिज्ञासा हो ।
कांति तुम्हारी सबसे न्यारी, तुम सुन्दरता की बलिहारी।
तुम सदगुण उपजाती जैसे, है तुमसे ही निर्मित नारी।
तुम मेरे स्वपनों में आती, आँगन में भी आ जाओ अब।
वर्षों से ये पुष्प है मुरझा, आके इसे खिला जाओ अब।
अधिक नहीं अब शब्द हैं मेरे, तुम इस हिय की भाषा हो।
तुम मेरी अभिलाषा हो ! तुम मेरी जिज्ञासा हो।
।। 14/03/2015 ।।
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्य।
सोमवार, 19 जनवरी 2015
तेरे ही स्वप्न में जाकर मैं पूरी रात करता हूँ ;
अँधूरा फिर भी रहता है,
मैं पूरी बात कहता हूँ।
तेरे ही स्वप्न में जाकर,
मैं पूरी रात रहता हूँ।
तुम मुझसे दूर जाती हो,
ये हरगिज सह नहीं सकता।
मैं तुमसे प्यार करता हूँ,
मैं तुम बिन रह नहीं सकता।
तुम मीलों दूर होती हो,
मैं तुमसे बात करता हूँ।
तेरे ही स्वप्न में जाकर,
मैं पूरी रात करता हूँ।
तुम्हीं संजीवनी मेरी,
तुम्हीं हर साँस मेरी हो।
लिखो ये जीवनी मेरी,
तुम्हीं अब आस मेरी हो।
पहुँचती राह सब तुम तक,
मैं रस्ते रोज चलता हूँ।
तेरे ही स्वप्न में जाकर,
मैं पूरी रात करता हूँ।
***
19/01/2015
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्य।
रविवार, 18 जनवरी 2015
अँधेरा मन में फिर क्यूँ है;
उजाला रोज होता है,
अँधेरा मन में फिर क्यूँ है!
तूँ मुझसे दूर है इतनी,
बसेरा मुझ में फिर क्यूँ है !
हूँ तुम बिन क्यूँ अंधूरा मैं,
तूँ मुझ बिन पूर कैसे है!
तुम्हें बस मैं मिला हूँ तो,
मिलन मजबूर कैसे है !
तूँ मुझसे कब मिली थी ये,
नहीं मैं जानता अब हूँ !
तेरा घर मन में है मेरे,
यही मैं मानता अब हूँ।
बहुत हैं हूर दुनियाँ में,
अदा ये तुममें फिर क्यूँ है!
तूँ मुझसे दूर जब इतनी,
बसेरा मुझ में फिर क्यूँ है !
बताती क्यूँ नहीं कुछ तुम,
तड़फ ये मन में कैसी है।
मना तुम क्यूँ नहीं करती,
झड़प ये मन में कैसी है!
बहुत अन्जान मैं जो हूँ,
तूँ भी नादान फिर क्यूँ है!
तूँ मुझसे दूर क्यूँ इतनी,
बसेरा मुझ में फिर क्यूँ है !
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्य।
दिनाँक: 18/01/2015
गुरुवार, 15 जनवरी 2015
मुझे अपनी खबर देदो।
मुझे अपनी फिकर देदो,
मुझे अपनी जिकर देदो,
तुम्हें मैं ढूँढता हर पल,
मुझे अपनी खबर देदो।
नहीं मैं हुश्न का मारा,
नहीं मैं इश्क को प्यारा,
नहीं मैं जानता कुछ भी,
कि तुम पर क्यूँ है दिलहारा।
मैं सूरज क्यूँ यहाँ पर हूँ,
यहाँ की चांदनी तुम क्यूँ!
नहीं जब मैं यहाँ रहता,
यहाँ की रौशनी तुम क्यूँ ?
अंधूरा काम जो मेरा,
वो पूरा तुम से होता है।
मुझे तुम क्यूँ नहीं मिलती !
सबेरा जब भी होता है।
सरल हर प्रश्न हैं मेरे,
इन्हें अपनी नजर देदो,
तुम्हें मैं ढूँढता हर पल,
मुझे अपनी खबर देदो।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्य।
दिनाँक:- 15/01/2015