गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

तेरे घर की ओर चलूँ मैं :-

प्रेम का प्यासा जीवन मेरा, प्रेम की आशा का घर तेरा,
तेरे घर की ओर चलूँ मैं, वर्षा ऋतु का मोर बनूँ मैं।

मेरे जीवन की उज्वलता, कहीं तुम्हारे पास रखी है,
बातों में तेरी कोमलता, मेरे घर की आस रटी है,
मेरी मोरनी क्या जानों तुम, सपन तुम्हारे रोज रचूँ मैं !
तेरे घर की ओर चलूँ मैं, वर्षा ऋतु का मोर बनूँ मैं।

श्रम से मुझमें थकन जो आती, एक पल मानों रुक जाता मैं,
इतने में जो तू मुस्काती, मानों तुझमें छुप जाता मैं,
तेरी प्रीत से मैं जीता अब, लक्ष्य के अपने ओर बढूँ मैं !
तेरे घर की ओर चलूँ मैं, वर्षा ऋतु का मोर बनूँ मैं।

कमी नहीं उत्साह की मुझमें, दुनियाँ में धुंधली ये पड़ती,
"मौर्य" नहीं देखा दुनियाँ में, मात्र आम की गुठली मिलती,
मेरी मोरनी आ जाओ अब, इस दुनियाँ में शोर बनूँ मैं !
तेरे घर की ओर चलूँ मैं, वर्षा ऋतु का मोर बनूँ मैं।
_________ ०९/१०/२०१४
     *** अंगिरा प्रसाद मौर्या ***
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मात्र आम की गुठली मिलती :- यहाँ पर यह पंक्ति बहुत ही महत्वपूर्ण है जिसको समझने हेतु विभिन्न दृष्टिकोणों से भिन्न भिन्न अनुवाद एवं आशय का जन्म हो सकता है। इसलिए इस की व्यख्या करने पर विवश एवं प्रतिबद्ध हूँ।
विचारणीय यह है कि आम की गुठली का ज्यादा महत्व नहीं है। जबकि पूरे आम का महत्व विश्व-व्याप्त है। इसी प्रकार हम एक सन्यासी न होकर हम श्रमिक हैं और बिना जीवनसाथी के सांसारिक संघर्ष में हमारी उर्जा कम पड़ जाएगी हम हतास भी हो जायेंगे। अतः हमारे जीवन में जीवन संगिनी बहुत महत्वपूर्ण है जो जीवन पथ पर हमें प्रोत्साहित करती है। इतने बड़े व्यख्या का पूरा सारांश यही है कि मैं एक गुठली हूँ और वो रस।